पपीते के पौधों की देखभाल कैसे और क्या करें इस विषय पर हमने पहले भी एक लेख लिखा था, अतः इस लेख में हम सिर्फ और सिर्फ उनके कीड़े एवं रोगों के बारे में चर्चा करेंगे| परंतु बिल्कुल सामान्य सी यह बात ध्यान में रखें कि यदि पपीते से अच्छी उपज लेनी है तो हर 25  से 30 दिन के अंतराल में:-

  • एक पपीते के वयस्क पौधे में कम से कम आधा किलो नीम की खली एवं ढाई सौ ग्राम बोन मील एवं 200 ग्राम जैविक खाद जरूर डालें इसके अलावा हम वर्मी कंपोस्ट गोबर की खाद १-२ किलो डाल सकते हैं
  • शुरुआत में 4 से 5 किलो कम्पोस्ट या वेर्मिकोम्पोस्त खाद डाल देने के बाद सिर्फ आधा किलो खाद बोनमिल, जैविक खाद एवं नीम के साथ डालने से पपीते की उपज काफी ज्यादा बढ़ जाती है|
  • यदि आपने अपने पपीते के बागान में काफी समय से कोई खाद नहीं दिया है तो शुरुआत में यह जरूर ध्यान रखें कि यदि पपीते के पौधे 6 महीने से छोटे हैं मतलब उसमें फल अभी बड़े नहीं हुए हैं फूल आ रहे हैं या 24 फल दिख रहे हैं तो प्रति पौधा कम से कम 1 किलो बोनमिल 1 किलो नीम खली 5 किलो वर्मी कंपोस्ट गोबर की खाद एवं ढाई सौ से तीन सौ ग्राम जैविक खाद का इस्तेमाल जरूर करें। 

सबसे जरूरी ध्यान में देने वाली यह बात है, जब भी किसान पपीते की खेती करते हैं तो नमी का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है | पपीते के पौधे जिस खेत पर लगें हैं वहां नमी यदि बहुत कम हो जाए तब भी दिक्कत होती है और नमी यदि ज्यादा हो तब भी दिक्कत होती है एवं कीड़े व रोग बढ़ जाते हैं।

पपीते के कुछ मुख्य कीट

आक का टिड्डा।

इनसे सबसे ज्यादा नुकसान यह होता है कि, यह पत्तियों को कुतर कुतर कर खा जाते हैं| यदि पौधे छोटे हैं तो पत्तियों को पूरी तरह से खत्म भी कर सकते हैं, जिसके कारण पौधे नहीं बढ़ पाते हैं, अगर यह कीट बहुत अधिक मात्रा में हैं, तो पौधे मर भी सकते हैं।

इनकी पहचान यह है कि यह कीड़े पीले रंग के होते हैं सर एवं वक्ष थोड़ा अनिल हरे रंग का और पेट के नीचे थोड़ा काला रंग की धारी होती है| यह ज्यादातर साल में दो बार पाए जाते हैं पहला जून से अगस्त के बीच में और दूसरा अक्टूबर के आसपास।

किसी भी कीट को खत्म कैसे करें या उससे बचाव कैसे करें, यह समझने के लिए हमें यह समझना जरूरी है कि वह बढ़ते कैसे हैं| आक के टिड्डे के साथ यह खासियत होती है कि, जो मादा होती है वह जमीन में अंडे देती है, तो इन्हें ख़त्म करने का सबसे आसन उपाय यह है कि मिट्टी को निरंतर उलट पलट करते रहें| इनके अंडे अधिकतर १०-२० सेंटीमीटर कि गहराई में पाए जाते हैं| जब घोटे कीट का जन्म होता है तो जो अंडे से निकलते हैं वह ज्यादातर घास खाते हैं| निरंतर पपीते के बगर में सफाई रखने से यह भी काफी हद तक नियंत्रण में रहते हैं| यदि पेड़ों पर पौधों पर यह कीड़े दिखाई दे रहे हैं तो कोई भी सामान्य जैविक कीट नाशक जैसे टर्मिनेट या नीम तेल या लेमन ग्रास का तेल का उपयोग किया जा सकता है।

फल भेदक मक्खी

हालांकि यह पपीता कि फसल को इतना ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाती है, क्योंकि कच्चे एवं कम पके हुए फलों में इसका प्रकोप नहीं होता है| यह सिर्फ जो फल ज्यादा पक जाते हैं, उन्हें इस को नुकसान पहुंचता है।इसीलिए यदि हमें अपने बागन को अच्छे से रखना है तो यह जरूर ध्यान दें, कि पके हुए फल कभी भी पेड़ पर ना छोड़ें। इसके अंडे भी मिट्टी में पाए जाते हैं इसीलिए समय-समय पर निंदाई-गुड़ाई करते रहना चाहिए|

चैंपा

चैंपा पत्तियों से रस चूसने का काम करता है और इसके बच्चे व बड़े दोनों ही पपीता की खेती को बहुत ज्यादा  नुकसान पहुंचा सकते हैं| सबसे ज्यादा दिक्कत यह होती है कि, यह रस चूसने के साथ साथ बहुत सारे बैक्टीरिया एवं वायरस के साथ फैलने वाले रोगों को भी आपके बागान में फैला देते हैं| यह काफी घातक होते हैं एवं इससे पेड़ों का बढ़ना रुक जाते हैं, फल और फूल आना बंद हो जाता है| चैंपा यदि आपके आसपास की खेतों में या आपके खेत में है तो हवा से भी काफी ज्यादा में फैलते हैं।

इनकी रोकथाम का सर्वोत्तम उपाय स्टिकी ट्रैप या चिपचिपा जाल होता है। हमारे सामान्य कीटनाशक दवा टर्मिनेट++ या डेढ़ लीटर नीम का तेल 100 लीटर पानी के साथ मिलाकर छिड़काव करने से भी यह रुक सकता है | इसके अलावा यदि रसायनिक इस्तेमाल करना पड़े तो इमिडाक्लोप्रिड को भी इस्तेमाल में लिया जा सकता है।

सफेद मक्खी

सफेद मक्खी बहुत सारी फसलों में पाई जाती हैं, उड़द, मूंग, आलू में नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ यह पपीता के लिए भी नुकसानदायक है। जब भी हम अपने खेत में घूमे तो पत्तियों के निचली सतह पर विशेष ध्यान रखें , जो कि सभी फसलों के साथ या देखरेख करने के लिए आवश्यक होता है कि हम उसके निचली परत पर जरुर ध्यान दें, कहीं कीड़े या अंडे या इस तरह का कुछ प्रकोप तो दिखाई नहीं दे रहा है| सामान्यता सफेद मक्खी पत्तियों कि उलटी सतह पर 100 से 200 तक अंडे देती हैं और इनसे छोटे-छोटे निकलते हैं| ये सुरुवात से ही पत्तियों का रस चूसने चालू कर देते हैं, इसके कारण पत्ती पीली पड़ जाती है| यह हालांकि सिर्फ रस चूसते हैं। यदि छोटे पौधों में इनका प्रकोप बढ़ जाता है तो उनमें फल और फूल नहीं के बराबर आते हैं। इनसे भी बचाव का सर्वोत्तम तरीका चिपचिपा ट्रिप लगाना होता है इसके अलावा नीम का तेल या इमिडाक्लोप्रिड भी काम करेगा

माइट

माइट की पहचान इस प्रकार होती है कि, ग्रसित पौधे में पेड़ों की पत्तियां पर पीले-पीले धब्बे दिखाई देंगे, पत्तियां सिकुड़ जाएँगी और उल्टी सतह पर या पत्ते की निचली सतह पर जाला जैसा कुछ आपको देखने को मिलेगा| उस जाले के नीचे माइट के छोटे-छोटे निम्फ व बड़े माइट 100 से हजारों की संख्या में रहते हैं| यह इतने बारिक होते हैं कि सिर्फ पॉइंट 2 मिली मीटर लंबे होते हैं। माइट से सबसे ज्यादा नुकसान छोटे पौधों को होता है, पर बड़े पेड़ों पर भी इनका विपरीत प्रभाव तो पड़ता ही है| इनके कारण पेड़ बीमार दिखाई देंगे उन की बढ़वार रुक जाएगी छोटे पेड़ों में अगर यह लग जाते हैं तो पेड़ मर भी सकते हैं| बड़े पेड़ों में अगर लग जाए तो फल की संख्या एवं फल का आकार छोटा हो जाएगा।

इन के प्रकोप से बचने के लिए कीड़े लगे हुए पत्तों को तुरंत जलाकर नष्ट कर देना चाहिए एवं टर्मिनेट या नीम के तेल का इस्तेमाल करना चाहिए| बहुत ज्यादा प्रकोप होने पर सल्फर या गंधक की धूल का छिडकाव कर  सकते हैं|

अब इसके बाद हम कुछ बीमारियों के बारे में चर्चा करते हैं जो कि पपीते के लिए ज्यादा नुकसानदायक हैं:-

तना सड़न

इसमें जो रोगी पौधे होंगे उसका निचले भाग की छाल जो है वह बिल्कुल जलीय हो जाती है, मतलब पिलपिला जैसे आप को दिखेगी और अनुकूल मौसम में यह बढ़कर पूरे तने को चारों तरफ से ग्रसित कर देता है| पेड़ों के ऊपर की पत्तियां सूखने या मरने लगेंगे एवं पीले पड़ जाएंगे और जहां यह रोग लगा है वह भाग कमजोर पड़ जाता है और पेड़ टूट कर गिर जाएगा।

इस बीमारी का सबसे बड़ा कारण है जल निकासी का इंतजाम सही नहीं होना| जिस स्थान पर भी पानी जम रहा है, वहां से जल निकासी की तुरंत व्यवस्था करें एवं जिस पेड़ में तना सडन दिख रहा है तुरंत जड़ से उखाड़ कर हटा देवें| एक बार तना सडन से ग्रसित हो जाने के बाद वापस पौधे को सुधारा नहीं जा सकता है।

इसके अलावा जमीन से 60 सेंटीमीटर ऊपर तक ताने पर बोर्डो का पेस्ट लगाकर तने के चारों तरफ मिट्टी में छह ६.5  सांद्रता वाला बोर्डो मिश्रण को 5 लीटर प्रति पेड़ में डालने से भी इस रोग को रोका जा सकता है| यह प्रक्रिया साल में तीन बार जून, जुलाई एवं अगस्त में जब जलभराव होने की स्थिति बनती है तब करना चाहिए । बोर्डो मिक्सर या बोर्डो पेस्ट कैसे बनाना है इसकी जानकारी आप हमारे दुसरे ब्लॉग में पढ़ सकते हैं।

फल गलन

इस बीमारी में आधे पके फल पर छोटे-छोटे काले गोल नमी युक्त धब्बे दिखाई देने लगते हैं, समय के साथ यह धब्बे धीरे-धीरे बड़े होते हैं और सारे धब्बे आपस में जुड़ जातें हैं और फल पूरी तरह गल जाता है। इसके रोकथाम के लिए टर्मिनेट++ या नीम तेल से किया जा सकती है|

एंथ्रेक्नोज

इसका प्रकोप छोटी कोमल ताने पर या टहनियों पर, फलों पर ,फूलों पर एवं पत्तियों पर दिखता है| इन पर गहरे  काले रंग के गोल या अंडाकार या कभी-कभी अन्य कारों के धब्बे पाए जाते हैं| रोग लगने के बाद पत्तियों का बढ़ना रुक जाता है, वह सिकुड़ जाता है| कभी-कभी रोग बढ़ जाने के कारण पत्तियां पर जो धब्बे बनते हैं वह सूख कर गिर जाएंगे अतः पेड़ में पेड़ की पत्तियों में छेद दिखाई देने लगेगा| कच्चे फलों पर काले धब्बे देखते हैं और धब्बों के नीचे का जो गुदा होगा वह सक्त होकर या हार्ड होकर फट जाता है और अंत में फल भी गिर जाता है | इसकी रोकथाम करने का सर्वोत्तम तरीका है कि रोगी पत्तियों की छटाई करके उन्हें जला दें एवं कवकनाशी तत्वों का इस्तेमाल करें|