• फूल आने के पहले एक छिड़काव सल्फर का (2.5 से 3 ग्राम प्रति लीटर पानी ) किया जाना चाहिए।

(पेड़ों में ज्यादा फूल के लिए सुदर्शन (३० मिली / 15 लीटर पानी )का छिडकाव करें )

  • ज्यादा ठण्ड पड़ने पर पाला के दुष्प्रभाव से बचने के लिए भी सल्फर का छिड़काव किया जाता है।

(जैविक किसान, खेत में शाम के वक्त धुआं करके भी फसल को पाला , ठण्ड के प्रभाव से बचा सकते हैं )

  • जो जैविक तरीके से बागवानी करते हैं, उन्हें वर्मिवाश एवं तम्बाखू से बने कीटनाशक का एक छिड़काव फूल आने से पहले कर लेना चाहिए।
  • सामान्यतः January 10-25 के बीच लीची के पेड़ों में फूल आना शुरू हो जाते हैं।
  • इस दौरान (अक्टूबर के बाद से ही) पेड़ों को पानी (सिंचाई) नहीं देना है।
  • जब तक फल मूंग या मटर के दाने के बराबर न हो जाएँ तब तक सिंचाई नहीं करनी है।
  • कोशिश ये करें कि कोई भी कीटनाशक का छिड़काव फूल लगने के समय में न करें, इससे फूल झड़ने की दिक्कत हो सकती है।
  • उपरोक्त के अलावा यह मित्र कीटों के लिए भी नुकसानदायक होता है।
  • जब मटर के दानों के बराबर फल हो गए हों तब आवश्यकता होने पर ही कीटनाशक का छिड़काव करें।
  • जैविक किसान नीमास्त्र या ब्रह्मास्त्र बनाकर छिड़काव कर सकते हैं। या बाजार में उपलब्ध अन्य जैविक कीटनाशक का प्रयोग करें।
  • जैविक कीटनाशक कभी भी फूलों एवं फलों या मित्र कीटों को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।
  • लीची के फलों के फटने की समस्या से छुटकारा पाने के लिए यह सुनिश्चित करें कि फल के बड़े होने से पकने तक पर्याप्त नमी बनी रहे।
  • कम गर्म इलाकों में 10 दिन के अंतराल में एवं ज्यादा गर्म इलाकों में 5-7 दिनों में सिंचाई करें।
  • नमी बनाये रखने के लिए मल्चिंग का इस्तमाल किया जा सकता है। इसके लिए सूखी पत्तियां या भूसा, पुवाल आदि को पेड़ के नीचे फैला दें।
  • जिस किसान को फल के फटने की ज्यादा दिक्कत आती हो, यह संभव है कि उस खेत में बोरोन की कमी है। ऐसा होने पर 80-100 ग्राम बोरेक्स 20 किलो गोबर की खाद में मिलाकर पेड़ों में डालें।