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पपीते के कीड़े एवं रोगों से बचने के उपाय

पपीते के पौधों की देखभाल कैसे और क्या करें इस विषय पर हमने पहले भी एक लेख लिखा था, अतः इस लेख में हम सिर्फ और सिर्फ उनके कीड़े एवं रोगों के बारे में चर्चा करेंगे| परंतु बिल्कुल सामान्य सी यह बात ध्यान में रखें कि यदि पपीते से अच्छी उपज लेनी है तो हर 25  से 30 दिन के अंतराल में:-

  • एक पपीते के वयस्क पौधे में कम से कम आधा किलो नीम की खली एवं ढाई सौ ग्राम बोन मील एवं 200 ग्राम जैविक खाद जरूर डालें इसके अलावा हम वर्मी कंपोस्ट गोबर की खाद १-२ किलो डाल सकते हैं
  • शुरुआत में 4 से 5 किलो कम्पोस्ट या वेर्मिकोम्पोस्त खाद डाल देने के बाद सिर्फ आधा किलो खाद बोनमिल, जैविक खाद एवं नीम के साथ डालने से पपीते की उपज काफी ज्यादा बढ़ जाती है|
  • यदि आपने अपने पपीते के बागान में काफी समय से कोई खाद नहीं दिया है तो शुरुआत में यह जरूर ध्यान रखें कि यदि पपीते के पौधे 6 महीने से छोटे हैं मतलब उसमें फल अभी बड़े नहीं हुए हैं फूल आ रहे हैं या 24 फल दिख रहे हैं तो प्रति पौधा कम से कम 1 किलो बोनमिल 1 किलो नीम खली 5 किलो वर्मी कंपोस्ट गोबर की खाद एवं ढाई सौ से तीन सौ ग्राम जैविक खाद का इस्तेमाल जरूर करें। 

सबसे जरूरी ध्यान में देने वाली यह बात है, जब भी किसान पपीते की खेती करते हैं तो नमी का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है | पपीते के पौधे जिस खेत पर लगें हैं वहां नमी यदि बहुत कम हो जाए तब भी दिक्कत होती है और नमी यदि ज्यादा हो तब भी दिक्कत होती है एवं कीड़े व रोग बढ़ जाते हैं।

पपीते के कुछ मुख्य कीट

आक का टिड्डा।

इनसे सबसे ज्यादा नुकसान यह होता है कि, यह पत्तियों को कुतर कुतर कर खा जाते हैं| यदि पौधे छोटे हैं तो पत्तियों को पूरी तरह से खत्म भी कर सकते हैं, जिसके कारण पौधे नहीं बढ़ पाते हैं, अगर यह कीट बहुत अधिक मात्रा में हैं, तो पौधे मर भी सकते हैं।

इनकी पहचान यह है कि यह कीड़े पीले रंग के होते हैं सर एवं वक्ष थोड़ा अनिल हरे रंग का और पेट के नीचे थोड़ा काला रंग की धारी होती है| यह ज्यादातर साल में दो बार पाए जाते हैं पहला जून से अगस्त के बीच में और दूसरा अक्टूबर के आसपास।

किसी भी कीट को खत्म कैसे करें या उससे बचाव कैसे करें, यह समझने के लिए हमें यह समझना जरूरी है कि वह बढ़ते कैसे हैं| आक के टिड्डे के साथ यह खासियत होती है कि, जो मादा होती है वह जमीन में अंडे देती है, तो इन्हें ख़त्म करने का सबसे आसन उपाय यह है कि मिट्टी को निरंतर उलट पलट करते रहें| इनके अंडे अधिकतर १०-२० सेंटीमीटर कि गहराई में पाए जाते हैं| जब घोटे कीट का जन्म होता है तो जो अंडे से निकलते हैं वह ज्यादातर घास खाते हैं| निरंतर पपीते के बगर में सफाई रखने से यह भी काफी हद तक नियंत्रण में रहते हैं| यदि पेड़ों पर पौधों पर यह कीड़े दिखाई दे रहे हैं तो कोई भी सामान्य जैविक कीट नाशक जैसे टर्मिनेट या नीम तेल या लेमन ग्रास का तेल का उपयोग किया जा सकता है।

फल भेदक मक्खी

हालांकि यह पपीता कि फसल को इतना ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाती है, क्योंकि कच्चे एवं कम पके हुए फलों में इसका प्रकोप नहीं होता है| यह सिर्फ जो फल ज्यादा पक जाते हैं, उन्हें इस को नुकसान पहुंचता है।इसीलिए यदि हमें अपने बागन को अच्छे से रखना है तो यह जरूर ध्यान दें, कि पके हुए फल कभी भी पेड़ पर ना छोड़ें। इसके अंडे भी मिट्टी में पाए जाते हैं इसीलिए समय-समय पर निंदाई-गुड़ाई करते रहना चाहिए|

चैंपा

चैंपा पत्तियों से रस चूसने का काम करता है और इसके बच्चे व बड़े दोनों ही पपीता की खेती को बहुत ज्यादा  नुकसान पहुंचा सकते हैं| सबसे ज्यादा दिक्कत यह होती है कि, यह रस चूसने के साथ साथ बहुत सारे बैक्टीरिया एवं वायरस के साथ फैलने वाले रोगों को भी आपके बागान में फैला देते हैं| यह काफी घातक होते हैं एवं इससे पेड़ों का बढ़ना रुक जाते हैं, फल और फूल आना बंद हो जाता है| चैंपा यदि आपके आसपास की खेतों में या आपके खेत में है तो हवा से भी काफी ज्यादा में फैलते हैं।

इनकी रोकथाम का सर्वोत्तम उपाय स्टिकी ट्रैप या चिपचिपा जाल होता है। हमारे सामान्य कीटनाशक दवा टर्मिनेट++ या डेढ़ लीटर नीम का तेल 100 लीटर पानी के साथ मिलाकर छिड़काव करने से भी यह रुक सकता है | इसके अलावा यदि रसायनिक इस्तेमाल करना पड़े तो इमिडाक्लोप्रिड को भी इस्तेमाल में लिया जा सकता है।

सफेद मक्खी

सफेद मक्खी बहुत सारी फसलों में पाई जाती हैं, उड़द, मूंग, आलू में नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ यह पपीता के लिए भी नुकसानदायक है। जब भी हम अपने खेत में घूमे तो पत्तियों के निचली सतह पर विशेष ध्यान रखें , जो कि सभी फसलों के साथ या देखरेख करने के लिए आवश्यक होता है कि हम उसके निचली परत पर जरुर ध्यान दें, कहीं कीड़े या अंडे या इस तरह का कुछ प्रकोप तो दिखाई नहीं दे रहा है| सामान्यता सफेद मक्खी पत्तियों कि उलटी सतह पर 100 से 200 तक अंडे देती हैं और इनसे छोटे-छोटे निकलते हैं| ये सुरुवात से ही पत्तियों का रस चूसने चालू कर देते हैं, इसके कारण पत्ती पीली पड़ जाती है| यह हालांकि सिर्फ रस चूसते हैं। यदि छोटे पौधों में इनका प्रकोप बढ़ जाता है तो उनमें फल और फूल नहीं के बराबर आते हैं। इनसे भी बचाव का सर्वोत्तम तरीका चिपचिपा ट्रिप लगाना होता है इसके अलावा नीम का तेल या इमिडाक्लोप्रिड भी काम करेगा

माइट

माइट की पहचान इस प्रकार होती है कि, ग्रसित पौधे में पेड़ों की पत्तियां पर पीले-पीले धब्बे दिखाई देंगे, पत्तियां सिकुड़ जाएँगी और उल्टी सतह पर या पत्ते की निचली सतह पर जाला जैसा कुछ आपको देखने को मिलेगा| उस जाले के नीचे माइट के छोटे-छोटे निम्फ व बड़े माइट 100 से हजारों की संख्या में रहते हैं| यह इतने बारिक होते हैं कि सिर्फ पॉइंट 2 मिली मीटर लंबे होते हैं। माइट से सबसे ज्यादा नुकसान छोटे पौधों को होता है, पर बड़े पेड़ों पर भी इनका विपरीत प्रभाव तो पड़ता ही है| इनके कारण पेड़ बीमार दिखाई देंगे उन की बढ़वार रुक जाएगी छोटे पेड़ों में अगर यह लग जाते हैं तो पेड़ मर भी सकते हैं| बड़े पेड़ों में अगर लग जाए तो फल की संख्या एवं फल का आकार छोटा हो जाएगा।

इन के प्रकोप से बचने के लिए कीड़े लगे हुए पत्तों को तुरंत जलाकर नष्ट कर देना चाहिए एवं टर्मिनेट या नीम के तेल का इस्तेमाल करना चाहिए| बहुत ज्यादा प्रकोप होने पर सल्फर या गंधक की धूल का छिडकाव कर  सकते हैं|

अब इसके बाद हम कुछ बीमारियों के बारे में चर्चा करते हैं जो कि पपीते के लिए ज्यादा नुकसानदायक हैं:-

तना सड़न

इसमें जो रोगी पौधे होंगे उसका निचले भाग की छाल जो है वह बिल्कुल जलीय हो जाती है, मतलब पिलपिला जैसे आप को दिखेगी और अनुकूल मौसम में यह बढ़कर पूरे तने को चारों तरफ से ग्रसित कर देता है| पेड़ों के ऊपर की पत्तियां सूखने या मरने लगेंगे एवं पीले पड़ जाएंगे और जहां यह रोग लगा है वह भाग कमजोर पड़ जाता है और पेड़ टूट कर गिर जाएगा।

इस बीमारी का सबसे बड़ा कारण है जल निकासी का इंतजाम सही नहीं होना| जिस स्थान पर भी पानी जम रहा है, वहां से जल निकासी की तुरंत व्यवस्था करें एवं जिस पेड़ में तना सडन दिख रहा है तुरंत जड़ से उखाड़ कर हटा देवें| एक बार तना सडन से ग्रसित हो जाने के बाद वापस पौधे को सुधारा नहीं जा सकता है।

इसके अलावा जमीन से 60 सेंटीमीटर ऊपर तक ताने पर बोर्डो का पेस्ट लगाकर तने के चारों तरफ मिट्टी में छह ६.5  सांद्रता वाला बोर्डो मिश्रण को 5 लीटर प्रति पेड़ में डालने से भी इस रोग को रोका जा सकता है| यह प्रक्रिया साल में तीन बार जून, जुलाई एवं अगस्त में जब जलभराव होने की स्थिति बनती है तब करना चाहिए । बोर्डो मिक्सर या बोर्डो पेस्ट कैसे बनाना है इसकी जानकारी आप हमारे दुसरे ब्लॉग में पढ़ सकते हैं।

फल गलन

इस बीमारी में आधे पके फल पर छोटे-छोटे काले गोल नमी युक्त धब्बे दिखाई देने लगते हैं, समय के साथ यह धब्बे धीरे-धीरे बड़े होते हैं और सारे धब्बे आपस में जुड़ जातें हैं और फल पूरी तरह गल जाता है। इसके रोकथाम के लिए टर्मिनेट++ या नीम तेल से किया जा सकती है|

एंथ्रेक्नोज

इसका प्रकोप छोटी कोमल ताने पर या टहनियों पर, फलों पर ,फूलों पर एवं पत्तियों पर दिखता है| इन पर गहरे  काले रंग के गोल या अंडाकार या कभी-कभी अन्य कारों के धब्बे पाए जाते हैं| रोग लगने के बाद पत्तियों का बढ़ना रुक जाता है, वह सिकुड़ जाता है| कभी-कभी रोग बढ़ जाने के कारण पत्तियां पर जो धब्बे बनते हैं वह सूख कर गिर जाएंगे अतः पेड़ में पेड़ की पत्तियों में छेद दिखाई देने लगेगा| कच्चे फलों पर काले धब्बे देखते हैं और धब्बों के नीचे का जो गुदा होगा वह सक्त होकर या हार्ड होकर फट जाता है और अंत में फल भी गिर जाता है | इसकी रोकथाम करने का सर्वोत्तम तरीका है कि रोगी पत्तियों की छटाई करके उन्हें जला दें एवं कवकनाशी तत्वों का इस्तेमाल करें|

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जैविक कीटनाशक : गौमूत्र एवं मिर्च

उपयोग:

लगभग सभी प्रकार के कीट पतंगों एवं सामान्य फफूंद जनित बीमारियों पर प्रभावकारी

आवयशक सामग्री :-

  • एक मुट्ठी तीखी लाल मिर्च का पाउडर या 10-15 मिर्च की चटनी

  • १ लीटर गौमूत्र

  • ५० ग्राम देसी साबुन

  • आधा लीटर पानी

 

बनाने की विधि :-

  • आधा लीटर पानी में देसी साबुन को घोल लेवें

  • इसके बाद मिर्च का पावडर या चटनी मिलाएं

  • बाल्टी में गौमूत्र लेवें एवं उपरोक्त मिश्रण को मिलाएं

  • एक डंडे से पूरी तरह मिला लें

  • सूती कपडे से मिश्रण को छान ले

  • एक से तीन घंटे के लिए रख दें

  • 10 लीटर पानी में मिलकर छिडकाव करें

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बैगन के बीजों का बीज-उपचार: रसायन मुक्त तरीके

जय जवान, जय किसान , जय विज्ञान

| स्वयं बनाये रसायन मुक्त खेती में प्रयुक्त होने वाली दवा, खाद एवं अन्य सामग्री |

रसायन मुक्त कृषि में बीज उपचार की लगभग 8-10 स्वदेशी तकनीक है, इस लेख में उनके अलावा फसल विशेष बीज-उपचार विधि के बारे में चर्चा करेगे | ध्यान रहे की इसके अलावा लगभग सभी देशी बीज-उपचार की विधि का भी इस्तमाल किया जा सकता है |

 

देशी गाय के दूध के साथ बैगन का बीज-उपचार

भिन्डी के बीजों को 10-15% गाय के ताजे दूध के घोल में 2-3 घंटे भीगकर बीज-उपचार करें | 10% (100 मिलीलीटर दूध 900 मिलीलीटर पानी के साथ, 15%- 150 मिलीलीटर दूध 850 मिलीलीटर पानी के साथ)

फायदे: वायरस जनित बिमारियों में कमी, अंकुरण क्षमता में बढ़ोतरी |

 

गौमूत्र (देशी गाय) से बैगन बीज-उपचार

बैगन के बीजों के 15% गौमूत्र के घोल में 30-45 मिनट भिगारक बीजों का बीज-उपचार करें| सामान्यतः गौमूत्र से बीज उपचार करते समय कम मात्रा में बीजों को उपचारित करके जांच लें | यदि गौमूत्र घोल ज्यादा तेज (गौमूत्र का ज्यादा %) होगा तो बीजों की अंकुरण क्षमता में कमी हो सकती है, इसलिए शुरुवात में या तो कम प्रतिशत घोल का इस्तमाल करें या तो कम बीजों के उपचारित करने के बाद जाँच लें

फायदे: अंकुरण क्षमता में इजाफा, डाई-बेक / गलन एवं अन्य मृदा जनित बिमारियों से छुटकारा

 

बायोगैस स्लरी से बैगन बीज-उपचार

बैगन के बीजों को 7-8 घंटे तक बायोगैस स्लरी में डुबाकर लगाने/बोने से सभी नुकसानदायक सूक्ष्मजीवों के नुकसान से बचा जा सकता है | जड़ों को बढ़ोतरी भी तीव्र गति से होती है

 

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भिन्डी के बीजों का बीज-उपचार: रसायन मुक्त विधियाँ

रसायन मुक्त कृषि में बीज उपचार की लगभग 8-10 स्वदेशी तकनीक है, इस लेख में उनके अलावा फसल विशेष बीज-उपचार विधि के बारे में चर्चा करेगे | ध्यान रहे की इसके अलावा लगभग सभी देशी बीज-उपचार की विधि का भी इस्तमाल किया जा सकती है |

देशी गाय के दूध के साथ भिन्डी का बीज-उपचार

भिन्डी के बीजों को 10-30% गाय के ताजे दूध के घोल में 4-6 घंटे भीगकर बीज-उपचार करें |

10% (100 मिलीलीटर दूध 900 मिलीलीटर पानी के साथ, 30%- 300 मिलीलीटर दूध 700 मिलीलीटर पानी के साथ)

फायदे: वायरस जनित बिमारियों में कमी, अंकुरण क्षमता में बढ़ोतरी |

गौमूत्र (देशी गाय) से भिन्डी बीज-उपचार

भिन्डी के बीजों के 7-12% गौमूत्र के घोल में 10 घंटे डुबोकर बीजों का बीज-उपचार करें |

सामान्यतः गौमूत्र से बीज उपचार करते समय कम मात्रा में बीजों को उपचारित करके जांच लें | यदि गौमूत्र घोल ज्यादा तेज (गौमूत्र का ज्यादा %) होगा तो बीजों की अंकुरण क्षमता में कमी हो सकती है, इसलिए शुरुवात में या तो कम प्रतिशत घोल का इस्तमाल करें या तो कम बीजों के उपचारित करने के बाद जाँच लें  

फायदे: अंकुरण क्षमता में इजाफा, पौधों का तीव्र संतुलित विकास

 

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मटका खाद

जय जवान, जय किसान , जय विज्ञान

| स्वयं बनाये रसायन मुक्त खेती में प्रयुक्त होने वाली दवा, खाद एवं अन्य सामग्री |

मटका खाद के फायदे :-

किफायती | सभी जगह आसानी से बनाया जा सकता है | मटका खाद बनाने के लिए सामग्री गाँव में ही उपलब्ध | खेत की उपजाऊ क्षमता  एवं सूक्ष्मजीवों की संख्या में तीव्र विकास | सही अंतराल में इस्तमाल से किसी भी अन्य खाद की आवश्यकता नहीं

सामग्री:-

  • देशी गाय का गोबर 10 किलो

  • देशी गाय का मूत्र 10  लीटर

  • काला गुड (देशी) 500 ग्राम

  • किसी भी दल का आटा : 500 ग्राम

  • पुराना मटका : एक 1

बनाने की विधि :-

  • सबसे पहले गुड को थोड़े से गौमूत्र में मिला लें, एवं सुनिश्चित करें की गांठ न बची हो

  • इसके बाद दाल के आटे को थोड़े से गौमूत्र में मिला लें

  • इसके बाद सभी सामग्री को मटके में डाल के हाँथ से से मिला लें

  • सभी सामग्री मिल जाने के बाद लकड़ी के डंडे से ३ मिनट सीधी दिशा में एवं ३ मिनट उलटी दिशा में घुमाएँ 

  • मटके के मुह को सूती कपडे से बांधकर छाव में 10 दिन के लिए छोड़ दें

  • प्रतिदिन सुबह एवं शाम इसको लकड़ी के डंडे से मिलाये

  • 10 दिन के बाद मटका खाद तयार है

उपयोग करने का तरीका :-

  • उपरोक्त मटका खाद 200 लीटर पानी मे मिलाने के लिए पर्याप्त है , इसे फसलों के बीच या मेड पर 12-15 दिन के अंतराल में छिडकें

  • सिंचाई के लिए 200 लीटर प्रति एकड़

सावधानी: 

  • खाद बन जाने के बाद 2-3 दिन के अन्दर ही इसका इस्तमाल कर लें

  • ध्यान रखें की जब खेत में पर्याप्त नमी हो तभी इसका छिडकाव करें

 

अधिक जानकारी के लिए: 

पत्राचार हेतु : वैदिक वाटिका, कैलाश ट्रेडिंग कंपनी के निकट, रास्ट्रीय राजमार्ग 78 . गम्हरिया, जशपुर नगर ४९६३३१ , छत्तीसगढ़ 

ईमेल : INFO@VEDICVATICA.ORG

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जीवामृत

जय जवान, जय किसान , जय विज्ञान

| स्वयं बनाये रसायन मुक्त खेती में प्रयुक्त होने वाली दवा, खाद एवं अन्य सामग्री |

फायदे:

  1. फसल कि संतुलित बढ़ोतरी में सहायक

  2. फल, फूल एवं उत्पादन क्षमता में इजाफा

सामग्री :-

  1. 200 लीटर पानी

  2. 10 किलो देसी गाय का गोबर

  3. 1 किलो पीसी हुई कोई भी दाल

  4. 1 किलो गुड

  5. 5 लीटर देसी गाय का मूत्र

  6. एक मुट्ठी सजीव मिट्टी 

बनाने कि विधि :

  1. एक ड्रम में 200 लीटर पानी डालकर सबसे पहले गुड मिलाएं (छोटे टुकड़े करके थोड़े से पानी में मिलकर, जिससे गठान या टुकड़े न बचें)

  2. इसके बाद पीसी हुई दल कि मिलाएं (दल को भी तोड़े से पानी में मिलकर पुरे पानी में मिलाएं ताकि गठान न बने)

  3. इसके बाद गोबर, गौमूत्र एवं सजीव मिट्टी मिलाएं 

  4. बांस या लकड़ी के डंडे से 10 मिनट तक एक दिशा में एवं 10 मिनट तक विपरीत दिशा में हिलाएं 

  5. ड्रम के मुह को बोर या सूती के कपड़े से ढककर 5-7 दिन के लिए छायादार स्थान पर छोड़ दें 

  6. प्रतिदिन शाम के समय एक बार 10 मिनट तक लकड़ी या बांस के डंडे से हिलाएं

  7. 30-48 घंटे में यह इस्तमाल के लिए तैयार हो जाता है 

उपयोग करने का तरीका :

छिडकाव हेतु :

  • 1 लीटर जीवामृत 10 लीटर पानी में मिलकर फसलों पर सुबह या शाम के समय छिडकाव करें

  • फसल कि स्थिति के अनुसार 7-10 के अंतराल में दोबारा उपयोग किया जा सकता है

सिंचाई में :

  • एक एकड़ खेत के लिए 200 लीटर जीवामृत सिंचाई के साथ उपयोग करें |

सावधानी :

  • 6-7 दिन के अन्दर ही इसका इस्तमाल कर लेवें 

  • ज्यादा पुराना होने के बाद यह उपयोग के लिए ऊयुक्त नहीं रहता 

अधिक जानकारी के लिए: 

पत्राचार हेतु : वैदिक वाटिका, कैलाश ट्रेडिंग कंपनी के निकट, रास्ट्रीय राजमार्ग 78 . गम्हरिया, जशपुर नगर ४९६३३१ , छत्तीसगढ़ 

ईमेल : INFO@VEDICVATICA.ORG

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अमृत घोल

जय जवान, जय किसान , जय विज्ञान

| स्वयं बनाये रसायन मुक्त खेती में प्रयुक्त होने वाली दवा, खाद एवं अन्य सामग्री |

फायदे :

  1. फसलों कि कीट रोधी क्षमता में बढ़ोतरी

  2. पौधों कि संतुलित बढवार

  3. कम मेहनत के साथ साथ सिर्फ 24 घंटे में तैयार

सामग्री:

  1. 1 लीटर गौ मूत्र

  2. 1 किलो गोबर

  3. 250 ग्राम गुड या 500 ग्राम सड़े हुए मीठे फल

  4. 10 लीटर पानी

बनाने कि विधि :

  1. 10 लीटर पानी में गोबर को मिलाये|

  2. इसके बाद गौ मूत्र मिलाएं|

  3. गुड को छोटे छोटे टुकड़े में तोड़ लें एवं थोड़े से पानी में मिलाएं| ध्यान रखे कि गुड का कोई टुकड़ा/गांठ न बचा हो, सभी पूरी तरह मिला लें |

  4. गुड के घोल को गोबर एवं गौमूत्र में मिला लें 

  5. घोल को ढक कर मिट्टी के बर्तन में 24 घंटे के लिए छोड़ दें | बर्तन के मुह को सूती कपड़े से ढक दें 

उपयोग करने का तरीका :

छिडकाव हेतु :

  • 10 लीटर पानी में 1 लीटर अमृत घोल मिलकर छिडकाव करें |

  • फसल कि बढवार एवं आवश्यकता अनुसार 8-12 दिन के अनातारल में इसका छिडकाव किया जा सकता है |

सिंचाई में :

  • एक एकड़ खेत के लिए 80-100 लीटर अमृत घोल सिंचाई के साथ उपयोग करें |

 

अधिक जानकारी के लिए: 

पत्राचार हेतु : वैदिक वाटिका, कैलाश ट्रेडिंग कंपनी के निकट, रास्ट्रीय राजमार्ग 78 . गम्हरिया, जशपुर नगर ४९६३३१ , छत्तीसगढ़ 

ईमेल : INFO@VEDICVATICA.ORG

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गाढ़ा अमृत घोल 

जय जवान, जय किसान , जय विज्ञान

| स्वयं बनाये रसायन मुक्त खेती में प्रयुक्त होने वाली दवा, खाद एवं अन्य सामग्री |

फायदा:

फसल कि बेहतर बढवार | स्वस्थ पौधे | सभी पोषक तत्व ग्रहण करने कि क्षमता में इजाफा | कम मेहनत में तैयार | नहीं के बराबर लागत | बाजार से कोई भी सामग्री खरीदने कि आवश्यकता नहीं

सामग्री :- 

  1. गौ मूत्र  (देशी, स्वक्षंद चरने वाली गाय का सर्वोत्तम): 5 (पांच) लीटर

  2. ताजा गोबर  (देशी, स्वक्षंद चरने वाली गाय का सर्वोत्तम) : 1 किलो

  3. ख़राब हो चुके (सड़ चुके या ज्यादा पके हुए ) फलों का रस : 5 लीटर

  4. 6-8 लीटर कि जगह वाला मिट्टी का बर्तन

  5. सूती कपडा

बनाने कि विधि :

  1. तीनो  घटक तत्वों (गौ मूत्र, गोबर एवं रस) को हाँथ से 10 मिनट तक मिलाएं

  2. सूती कपड़े से मिट्टी के बर्तन में ढक कर 5 दिनों के लिए छोड़ दें

उपयोग करने का तरीका :

  • सिंचाई के पानी के साथ गढ़ा अमृत घोल का प्रयोग करें

  • विशेष : प्रति एकड़ 25-30 लीटर गढ़ा अमृत घोल का प्रयोग सर्वोत्तम है

अधिक जानकारी के लिए: 

पत्राचार हेतु : वैदिक वाटिका, कैलाश ट्रेडिंग कंपनी के निकट, रास्ट्रीय राजमार्ग 78 . गम्हरिया, जशपुर नगर ४९६३३१ , छत्तीसगढ़ 

ईमेल : INFO@VEDICVATICA.ORG

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Importance of Tree in Farm

When we talk or practice Chemical Free Farming the importance of having few trees in the farm cant be ignored.

SAMPLE TEST :-

Following are few of the most important benefits of having trees in farmland:

1. Manage soil and reduce erosion

Soil erosion reduces the fertility of soil as it removes the topsoil (the most fertile part) along with the organic matter and the microorganism present in it.

Erosion is most common in areas with high rainfall and high wind. Traditionally the trees are planted at borders for reducing the wind speed (as wind barriers). It should also be planted with proper planing within the farm as the deep roots improves soil fertility by bringing back minerals and nutrients from deep earth, all these minerals are available to the farm land via decaying of fallen leaves.

2. Improve Microbial Activity

3. Shade and Better Environment for Crops

4. Water management

5. Fuel and Composting materials

6. Habitat for Birds & Pollinators

7. Improving Bio Diversity

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Chemical Free Farming: 1) Why & How

Article 1 of 10

Before jumping to the discussion regarding the chemical free farming we will go through some of the main reasons that forced the world to consider the traditional farming system once again. We all know the ill effect of modern day farming methods on Health, Environment and on Ecosystem so we will not discuss the problem in details:-

(image: terimrama_org)

Few of the major issues with (so called) modern day chemical based farming practice:-

  • Farming system based on pesticides and chemicals aren’t sustainable in long run. There are numerous examples in India itself, and more farmers are realizing this as time passes by. Major issue is that input cost goes on increasing year by year and after reaching a threshold the production level starts decreasing rapidly despite increasing the inputs.
  • Whole Ecosystem is being polluted, The problem is so severe that the pesticide residue are now a day’s even found in the mother’s milk, leave apart the residue in agricultural products. This is resulting is exponential increase in disease like cancer and other especially in areas where the chemical farming is practiced in large scale.
  • Larger Impact is seen on wildlife and insects. Due to pollution &Destruction of habitat (result of mono-cropping) many beneficial insects for farmers are becoming extinct and these results in widespread pest infestation in crops and resulting in economic loss to farmers.


All of the above is resulting in increase in farmers input cost. Most important point is the crop that he grows using the chemical based inputs lacks strength and is weak and more susceptible to the environmental related issues and also more attractive to pests and diseases.

  • When a farmer practices chemical based farming he is dependent on market for each and every input he uses for cultivation.

Usually there are many myths surrounding organic farming that prevents farmers from even thinking of changing their chemical based farming practice to chemical free farming method.


Few most important points that we came across during our awareness and training work in Jashpur (Chhattisgarh) are as follows :-

(We will explain all these points in details in coming articles)

  • Chemical Farming is Cheaper or Organic Farming is Expensive Farming :-
  • Its belief that without adding chemical fertilizers one cannot get sufficient amount of production from farm.
  • Organic produce costs more to grow hence selling at higher price is an issue
  • Organic Pesticides and manures/ preparations are expensive and not easily available.
  • To start chemical free farming one need extensive and expensive training
  • To start Chemical Free Farming one need to work on land for 2-3 years to get sufficient returns

And many more such ………

However none of the above is correct and true…..